अब चेक बाउंस नहीं होगा अपराध -नए कानून का प्रस्ताव, रिकवरी के लिए क्रिमिनल की बजाय दायर होगा सिविल दावा
Now check bounce will not be a crime – new law proposed
चेक क्या होता है –
चेक एक प्रकार का नोट होता है बस इसपर नोट की तरह पहले से उसकी क़ीमत नहीं लिखी होती है यह बैंक द्वारा जारी किया गया होता है जो नोट के समान ही अपना मूल्य रखता है तथा उसका मूल्य चेक धारक खुद सुनिश्चित करता है, चेक पर जो भी मूल्य अंकित किया जाता है उसकी बैल्यू उतनी तय हो हो जाती है नोट और चेक में फ़र्क़ सिर्फ़ इतना ही की इसे आम दुकानो या बाज़ार में कैश की तरह इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है। इसका मूल्य बैंक या बड़े दुकानदारों पर ही सम्भव है। इसलिए ऐसा कहा जा सकता है की चेक की क़ीमत भी नोट की तरह ही है बस उपयोग थोड़ा भिन्न है अब चेक बाउंस नहीं होगा अपराध -नए कानून का प्रस्ताव, रिकवरी के लिए क्रिमिनल की बजाय दायर होगा सिविल दावा
क्या और कैसे होगा बदलाव :-
केंद्र सरकार के वित्त एवं वित्तीय सेवा मामलों के मंत्रालय के द्वारा एक नया प्रस्ताव लाने पर विचार कर रही है जिसके तहत चेक बाउंस को अपराध की श्रेणी से हटाने की तैयारी चल रही है,इसपर नया कानून बना तो फिर चेक बाउंस होना अपराध नहीं होगा। रिकवरी के लिए क्रिमिनल के बजाय सिविल दावा दायर किया जाएगा,संबंधित पक्षकारों से इसपर सुझाव मांगे गए हैं।जिसके बाद इसे लागू करने पर विचार किया जाएगा।फ़िलहाल यह बदलाव अभी प्रस्तावित है इसपर विचार करके यदि पारित हुआ तो इसमें मौजूदा बदलाव निम्न प्रकार से किए जाएँगे जिसकी जानकारी हमने इस पोस्ट के माध्यम से साझा करने का प्रयास किया है ।ताकि आने वाले बदलाव को लेकर आप सब जागरूक हो सकें तथा इस बदलाव को स्वीकार कर सफलता पूर्वक लाभ उठाएँ ।
प्रदेश में लगभग 3 लाख और देश में 40 लाख मामले चेक बाउंस के मामले पेंडिंग हैं। जिसमें दो साल तक की सजा एवं चेक वेल्यू से दो गुना जुर्माने या दोनों का रखा गया प्रावधान हैं। कानूनविदों का इस मामले पर विचार माँगा गया तो उनका कहना है कि नया कानून चेक के बेईमानी केसों की संख्या कम करने में कामयाब ज़रूर होगा लेकिन, इससे एनआईएक्ट जो लागू किया गया था उसका उद्देश्य ही खत्म हो जाएगा।
निवेशकों में बढ़ेगा विश्वास-
मंत्रालय द्वारा वर्तमान में कोविड: 19 का हवाला देते हुए चेक बाउंस केसों से एनआईएक्ट- 1881 की धारा 138 को छोटे आर्थिक अपराधों की श्रेणी से बाहर करने का प्रस्ताव दिया है। वर्तमान हालात को देखते हुए यह दलील दी गयी है कि देश कोविड: 19 से गुजर रहा है। ऐसे में व्यवसायियों एवं निवेशकों में विश्वास जगाने के लिए ऐसा करना आवश्यक होता जा रहा है। अपराध की श्रेणी से बाहर करने से व्यवसाय में सुधार होगा, तथा लोगों में डर का अभाव होगा। जिसके चलते लोग व्यापार करने में बढ़ोतरी करेंगे।
कानूनविदों की राय-
- अधिवक्ता के खंडेलवाल का कहना है चेक बाउंस को अपराध की श्रेणी से बाहर करने से धोखा देने के लिए प्रोत्साहन मिलेगा।लोग आसानी से कपट वश यह कार्य करने में कामयाब होंगे।
- अधिवक्ता वी सोमानी का कहना है कि चेक गारंटी बरकरार रखना जरूरी है। लेकिन इससे व्यापार में भरोसा कम होगा।तथा कारोबारियों के मन में डर पैदा होगा।
- अधिवक्ता मोहन सिंह का मानना है कारोबार के लिए सहुलियतें दिए जाने के लिए चेक बाउंस को अपराध से बाहर करना सही फ़ैसला है।
- अधिवक्ता रमेश गुप्ता का कहना है नोटिफिकेशन की तारीख से यह कानून लागू होगा। लंबित केसों पर इसका असर नहीं होगा।
आम जनता की राय-
लोगों का कहना है कि इसे अपराध की श्रेणी से बाहर लाना अति आवश्यक हो गया है क्योंकि इसका दुरपयोग काफ़ी बुरी तरीक़े से किया जा रहा था,कई बार ऐसा देखा गया है की कोई व्यक्ति किसी मजबूरी वश कुछ पैसे का क़र्ज़ किसी दोस्त व रिस्तेदार से लेता था जब वह विपरीत हालातों में इसको समय से चुका नही पाता है तो गारंटी के तौर पर लिया गया ब्लैंक चेक का ग़लत उपयोग करके अधिक राशि (अपनी मर्ज़ी मुताबिक़) भरकर चेक बाउंस कराकर एनआई एक्ट का दुरपयोग किया जाता है,जिससे लोगों को बड़ी परेशानियों से गुजरना पड़ता है। इस हालात में कई बार बेगुनाह होते हुए भी लोगों को जेल की सजा कटनी पड़ती है या भारी जुर्माने भरते है जिसके चलते लोगों के मन में चेक को लेकर ग़लत धरना बनती जा रही है। इसलिए यह सही फ़ैसला होगा।
मौजूदा धारा 138 N.I. Act में कोर्ट का फ़ैसला, उदाहरण –
चेक बाउंस के मामले की सुनवाई पूरी करते हुए अपर मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी रजनी कुमारी ने दोषी चंद्रभूषण सिंह को दो साल कारावास की सजा सुनायी थी । वह काजीमोहम्मदपुर थाना के कलमबाग रोड स्थित पंजाबी कॉलोनी का निवासी है। मामले को लेकर दामुचक निवासी कुमारी सारिका ने वर्ष 2011 में उसके खिलाफ सीजेएम कोर्ट में मुकदमा दर्ज कराया था। जिसमें उन्होंने आरोप लगाया कि चंद्रभूषण ने उससे दो लाख रुपये कर्ज के रूप में लिए थे। एक साल में रुपये लौटाने की बात तय की गयी थी, लेकिन एक साल बीतने के बाद काफी दिनों तक दौड़ भाग करने पर चेक दिया था । खाते में राशि नहीं होने के कारण चेक बाउंस हो गया। जिसमें एनआई एक्ट के तहत आपराधिक मामले में कोर्ट ने 23 जुलाई 2012 को मामले में चंद्रभूषण के खिलाफ संज्ञान लेकर फ़ैसला लिया था।
धारा 138 N.I. Act में पुलिस का रोल –
पुलिस चाहे तो इसमें 420 IPC के तहत एफ आई आर करके मामले को संज्ञान में ले सकती है पर ऐसा करती नहीं है परंतु यदि कोर्ट का ऑर्डर मिल जाए तो एफ आई आर करके दोषी को जेल में डाल सकती है इसके साथ ही पुलिस कोर्ट के वारंट ऑर्डर पर भी दोषी को गिरफ़्तार करती है साथ ही यदि आरोपी पर कई लोगों के द्वारा चेक बाउंस का आरोप है तो ऐसे में 420 IPC में एफ आई आर करवाना बहुत अनिवार्य हो जाता है।इसमें पुलिस आसानी से संज्ञान लेने को मान भी जाती है।
दूसरा ऑप्शन –
सिविल केस 37 C.P.C वर्तमान में भी यह मुक़दमा फ़ाइल किया जा सकता है तथा NI एक्ट में बदलाव के बाद भी दिवानी मुक़दमा यानी सिविल केस ऑर्डर 37 C.P.C के अंतर्गत सिविल कोर्ट में मुक़दमा दयार करके के हक़दार होंगे इसको फ़ाइल करने की समय सीमा चेक बाउंस के तीन साल के भीतर है।इसके अंतर्गत लोग वाद दयार करने से बचते इसलिए है क्योंकि इसमें मौजूदा राशि का कुछ पर्सेंट एक निर्धारित राशि के रूप में कोर्ट में फ़ाइल करते समय जमा करना अनिवार्य रखा गया है।यही सबसे बड़ा कारण है कि कोई भी व्यक्ति सिविल मुक़दमा दायर करने से बचता है।
निष्कर्ष –138 N.I. Act. के द्वारा लोग आसानी से बिना कोर्ट को एक निर्धारित रक़म दिए केस करके अपना पैसा वसूल कर सकते थे वही दूसरी ओर सिविल मुक़दमा दयार करने में उन्हें रक़म जमा करने में सबसे बड़ी परेशानी का सामना कर पड़ता है।पर NI एक्ट में हो रहे इस बदलाव का फ़ायदा यह है की झूठे आरोपे लगाने वाले केस से छुटकारा मिल जाएगा पचास हज़ार की रक़म लेने के नाम पर अक्सर लोग पाँच लाख का मुक़दमा कर देते थे, क्योंकि उन्हें उसके लिए कोर्ट में कोई मोटी रक़म सुरक्षा के तौर पर जमा नहीं करण पड़ता था। मौजूदा बदलाव होने के बाद झूठे मामलों की संख्या में कमी आएगी साथ ही लोगों का खोया हुआ विश्वास भी वापस आएगा।
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चेक बाउंस को अपराधिक वाद से अलग करना मेरे नजर में बहुत ही त्रुटिपूर्ण पूर्ण निर्णय होगा आप अगर किसी से कोई कर्ज या बकाया लेते हैं तो आप एक निश्चित समय के बाद उसका भुगतान क्यों न करेंगे अगर आपने 50000 ही किसी से लिए हैं और आपकी मंशा साफ है तो आप निर्धारित तिथि का अपने हाथों द्वारा भरकर के सामने वाले को दे सकते हैं यह आपका भी फर्ज बनता है कि किसी ने आपकी मदद की है या व्यवसाय में आपको उधार दिया है तो आप एक निश्चित समय के बाद उस बकाए का भुगतान करें यह ना कि पैसा या समान ले लेने के बाद उसके भुगतान के लिए सहयोग और समय देने वाले को ही परेशान करें झूठे केस ज्यादातर चेक देने वाले व्यक्ति की कपट पूर्ण स्थिति के वजह से ही होती है अगर आपकी नियत साफ है तो आप निश्चित तिथि को निश्चित वो रकम का भुगतान लिख करके चेक से दे देंगे इससे आपके और सामने वाले के संबंध पर भी स्पष्ट व्यवहार नजर आएगा चेक बाउंस को अपराध की श्रेणी से बाहर निकालना निंदनीय होगा