Husband can also file complaint against wife for domestic violence
पति घरेलू हिंसा के लिए पत्नी के खिलाफ भी शिकायत दर्ज करा सकता है hindu marriage act 1955 13 b (i-a) DV act
अक्सर हम सभी पति द्वारा पत्नी पर अत्याचार ,उत्पीड़न, दहेज की मांग एवं ना मिलने पर मारपीट की घटनाएं आए दिन समाचार पत्रों एवं न्यूज़ चैनल के माध्यम से सुनते देखते रहते हैं। लेकिन सिक्के के हमेशा दो पहलु होते हैं। हमेशा पतियों द्वारा हाई पत्नियों को प्रताड़ित नहीं किया जाता है कुछ मामलों में महिलाएँ भी ऐसा करती हुयी पायी गयी हैं इस लेख द्वारा हम पतियों के संबंध में बात करेंगे। की आप पतियों की अपने पत्नियों से उत्पीडऩ होने पर क्या करना चाहिए और और उन्हें क़ानूनी मदद कैसे मिल सकती हैं यद्यपि इस लेख में हम हिन्दु विधि के तहत कानून की चर्चा कर रहे हैं लेकिन बहुत सारे उपाय इसमें ऐसे भी हैं जो वो मुस्लिम पतियों पर भी लागू होते हैं।पूरी जानकारी के लिए कृपया पूरा पोस्ट ध्यान पूर्वक पढ़ें ।
पत्नियों के लिए बने कानून पतियों के जी का जंजाल बने-
बहुत पहले से यह हम सब सुनते आ रहें है और पहले अक्सर ऐसा होता भी था की पुरुष द्वारा कई प्रकार से महिलाओं पर हिंसा एवं प्रताड़ना दी जाती थी समाज की बढ़ती माँग को देखते हुए सरकार द्वारा काफी सख्त कानून बना दिया गया । खासकर भारतीत दंड विधान की धारा 498 A एक ऐसा कठोर कानून है जिसने तमाम बेक़सूर पतियों का जीवन बर्बाद कर दिया। तथा बहुत सारे गुनहगारों को सजा भी दिलाई । विभिन्न न्यायालयों ने भी इसका उपयोग करके इसे और भी सख्त एवं मज़बूत कर दिया। धारा 498 A में साधारण तया ” दहेज को लेकर पत्नियों को torturing करना” शामिल है । इसे संज्ञेय एवं ग़ैर ज़मानती बनाया गया है । बाद में नियमन आया कि torturing म़े शारीरिक ही नहीं मानसिक दशा भी शामिल हैं। मतलब ये हुआ की कोई पति यदि अपनी पत्नी को मारपीट नहीं भी करता है। बल्कि दहेज लेकर धमकी भी देता है तो वह मामले धारा 498 A के तहत अपराध किए समझे जाएंगे। यदि पत्नी मायके में भी रह रही है और कोई पति मोबाइल से भी वापस बुलाने की नियत से धमकी दे दे तो पत्नी का मानसिक उत्पीडऩ किया गया माना जायगा और पत्नी यदि मुकदमा दर्ज करा दे तो पति को जेल की हवा खानी पड़ सकती है।
माननीय सर्वोच्च न्यायालय नें जब इन तथ्यों को महसूस किया एवं निर्देश दिया कि धारा 498 A के तहत मामला दर्ज होने पर तुरंत गिरफ्तारी न की जाए पहले तथ्यों की जाँच {investigation} की जाय । पत्नी ऐसे मामलों में मुकदमा दर्ज कराती थी तो पति के रिश्तेदारों को भी साथ घसीट लेती थी । यानी अपने सास ससुर देवर ननद इत्यादि को भी अभियुक्त अक्सर बनाती ही थी। माननीय सुप्रीम कोर्ट द्वारा अब इस मामले में थोड़ी राहत दे दी गयी है। अब आमतौर पर पति के रिश्तेदारों को न्यायालय जमानत दे देती है लेकिन पति बेचारा अब भी फँस जाता है।
पत्नी की धमकियों एवं प्रताड़ना से कैसे बचा जा सकता है –
सबसे पहले तो खुद को मानसिक रूप से मजबूत करें। आप निर्दोष हैं तो कानून आपको सजा नहीं देगी । कानून अपराधियों को सजा देने के लिए बनी है। इसलिए सजा भी उसे हाई होगी जो गुनहगार है।
भारतीय कानून का इस आधार पर कार्य करता है कि यदि कोई व्यक्ति किसी के सामने अपराध करता है या अपराध की धमकी देता है तो एक नागरिक का कर्तब्य है कि वह पुलिस को सूचित करें। इसलिए ही कानून भी बना है कि प्राथमिकी कोई भी ब्यक्ति करा सकता है ये जरूरी नहीं कि जिसके साथ घटना घटी है वही FIR (प्राथमिकी) दर्ज कराए ।
F I R ( first information report) या प्राथमिकी क्या है –
1) मतलब साधारणतया ये है कि एक नागरिक को अपराध की पहली सूचना अवश्य पुलिस को देनी चाहिए। जिसे FIR ( first information report) या प्राथमिकी कहा जाता है।
2) पति को यदि पत्नी गलत धमकी देती है या झूठे मुकदमें मे फंसाने की धमकी देती है तो स्पस्टतः वह अपराध कर रही है। पति को अविलंब पत्नी के विरूद्ध प्राथमिकी दर्ज करानी चाहिए। क़ानून में सभी नागरिक को अपने बचाव में समान अधिकार दिए गये है।पति को भी पूरा अधिकार है की वह पत्नी के ख़िलाफ़ पुलिस FIR करे ।
3) यदि कोई पति यह मानकर चुप रहता है कि पत्नी torturing के केश में फंसा देगी तो वह गलती कर रहा है। जुर्म को सहने से अपराध बढ़ता है हो सकता है आपके आवाज़ उठाने से आपकी पत्नी डर जाए तथा शांत हो जाए। और आपके आगे का जीवन अच्छा शुखमय एवं शांतिपूर्ण व्यतीत हो।
4) इसलिए जब पत्नी किसी निर्दोष पति को केवल अपनी बात मनवाने हेतु, पिता माँ से अलग करवाने, पति अपने भाई बहन जरूरतमंद रिश्तेदार की मदद ना कर सके इत्यादि कारणों से झूठे मुकदमों में खासकर 498A में यानी दहेज प्रताड़ना के मामले में फंसा देने की धमकी देती है , या कभी तो आत्महत्या कर लेने की धमकी ( आत्महत्या की धमकी को अक्सर पत्नियां बड़ा हथियार के रूप में उपयोग करती है) तो पति के लिए यह आवश्यक है की वह बिना देर किए अपने पत्नी के विरूद्ध पुलिस को शिकायत दर्ज करवा दे। क्योकि यदि आपकी पत्नी ने पहले सिकायत कर दी तो बाद में ना पुलिस आपकी कुछ सुनेगी ना कोई प्रशासन ।उस वक्त यह बात बताने पर बल्कि पुलिस उल्टा आपको ही दोष देगी कि यदि मामला पत्नी द्वारा झूठे मुकदमें में फंसाने की धमकी का था तो आपने किसके पास शिकायत की या सूचना दी। साफ साफ मतलब ये कि यदि आप चुप चुप करते रह गये और पत्नी ने ही मुकदमा पहले कर दिया तब आप खुद को परेशानी में डाल लेंगे।
5) तो दिल को मजबूत कर पत्नी के धमकियों पर बिना देरी किए कार्यवाही करें। मामले आगे बढ़े उसके पहले ही कानूनी कार्यवाही कर मामले का अंतिम निदान भविष्य के लिए बेहतर है।
a) भारतीय दंड संहिता की धारा 506 के अनुसार अगर कोई ब्यक्ति किसी को झूठे मुकदमें में फंसा देने की धमकी देता है तो वह अपराध की श्रेणी में आता है जिसकी सजा 2 साल है। यदि धमकी अपराध करने की देता है तो इसे अपराधिक अभित्रास कहा जायगा जिसकी सजा 7 वर्ष या जुर्माना या दोनो है।
b) यदि कोई व्यक्ति आत्महत्या का प्रयत्न करेगा और ऐसा करने के लिए कोई कार्य करेगा तो वह व्यक्ति 1 वर्ष के कारावास से दंडित होगा। भारतीय दंड विधान की धारा 309 में ये प्रावधान है । अब मोदीजी के सरकार द्वारा इस धारा में बदलाव किए गये हैं तथा इसे अपराध की श्रेणी से हटा दिया गया है। लेकिन व्यापक छान बीन की ब्यवस्था की गई है और आप जाँच में बता सकते हैं कि आत्महत्या की धमकी केवल आपको मानसिक उत्पीड़न के लिए दी गई है ।
तो उपरोक्त धाराओं में पति प्राथमिकी दर्ज कराकर वास्तविक निदान के लिए रास्ता निकाल सकता है। इससे दो फायदे हों सकते है ।
- ये कि पत्नी को ये समझ आ जायगा कि पति उसकी बात मानने के लिए तैयार नहीं है।और वह हमेशा के लिए शांत हो जाए तथा आपके साथ प्यार से रह सकती है।
- कि पति serious है और गलत बात स्वीकार नहीं करेगा ।तो वह आपको बेवजह धमकाना छोड़कर शांतिप्रिय जीवन व्यतीत कर सकती है।
यदि पत्नी को समझ आ जाय तो अप दोनो के रिश्ते के लिए बेहतर होगा सुलह का दरवाजा भी हमेशा खुला रखें, यदि पत्नी इतना करने के बाद सबकुछ भूलकर वापस आना चाहती है तो अच्छी बात है अप भी सबककुछ भूलकर आगे बढ़ें।
यदि इन सबकी वजह से आपके रिश्ते में कोई दरार आ जाए तो भी आपके पास एक मौक़ा और है अपने रिश्ते को सुधारने का जिसका उपयोग आप इस प्रकार कर सकते है।
हिन्दु विवाह भरण पोषण अधिनियम की धारा 9 का उपयोग कर दाम्पत्य जीवन के बचाव व मामले के निदान के लिए आप कोर्ट का दरवाज़ा खटखटा सकते है।
उपरोक्त मामले समझने के लिए इसकी विस्तृत व्याख्या इस प्रकार से है। आप परिवार न्यायालय में हिन्दु विवाह एवं भरणपोषण अधिनियम के धारा 9 के तहत भी मुकदमा दर्ज करा सकते हैं। प्रत्येक जिला में परिवार न्यायालय होते हैं। तो आप धारा 9 के तहत भी आगे बढ़ सकते हैं। धारा 9 के तहत आते हैं ” दाम्पत्य जीवन में पुनर्सुधार ” इसे अंग्रेजी में कहते हैं ” Re-institution of conjugal right.” जिसके द्वारा आप अपने रिश्ते को बचाने के लिए एक और मौक़े की गुहार न्यायालय में लगा सकते है।
क ) यदि पति पत्नी के संबंधों में खटास आ गई हो तो संबंधों में सुधार हेतु धारा 9 का मुकदमा दर्ज कराएं आप अपनी सारी बातों को ,पत्नी द्वारा किये जा रहे गलत कार्य ब्यवहारों की लिखित शिकायत परिवार न्यायालय के समक्ष कर सकते हैं। परिवार न्यायालय पति पत्नी के मध्य दापंत्य जीवन में सुधार लाने हेतु counselling करता है और अधिकांशतः मामले का निदान भी हो जाता है।
ख) परिवार न्यायालय का पूरा जोर दोनों पक्षों में सुलह कराने का ही रहता है। ये एक civil right है। धारा 9 के तहत दर्ज कराया गया मामला सिविल प्रकृति है।
ग) इस मुकदमें को दर्ज करने के कई फायदे हैं। आप केवल आपसी संबधों में सुधार करा देने की प्रार्थना न्यायालय में करते हैं तो पत्नी के भी समझ में आता है कि संबंध सुधार का केश केवल है तो उसको भी एक राहत रहती है। पर यह एक प्रकार से legal threat के तरह भी काम करता है।
घ) इससे पत्नी की मानसिकता न्यायालय में exposed हो जाती है और ये स्पस्ट होने लगती है कि पति की गलती नहीं है।
ड़) न्यायालय का भी प्रथम द्रष्टव्या जो महिला के support में motivation होता है वह आपके द्वारा संबंध में सुधार का केश करने से आपके पक्ष में आने लगता है।
इसके बावजूद यदि धारा 498 A का केश पत्नी करती है तो आपको जमानत लेने में न्यायालय का ध्यान आप अपने Re-institution of conjugal right के मुकदमा की ओर दिला सकते हैं और न्यायालय का motivation आपकी ओर होने लगता है।
क़ानूनी दुनिया के सभी लोग धारा 9 के महत्व को समझते हैं। अधिकांश अधिवक्ता सर्वप्रथम इसी धारा को उपयोग करने की सोचता है और उपयोग करता है क्योंकि ये मानवीय संवेदना से भरा हुआ धारा है जिसमें किसी अधिवक्ता को अपने क्लाइंट के घर बस जाने की उम्मीद रहती है और क्लाइंट का बचाव बेहतर होता है।
हिन्दु विवाह व भरण पोषण अधिनियम की धारा 13 –
तमाम उपाय,परिवार न्यायालय के counselling से भी यदि मामले का निदान न हो पाए। पत्नी अड़ी रहे, अपनी बात मनवाने के लिए न्यायालय की भी परवाह न करे तो फिर ऐसे पत्नी से निजात पा लेना ही बुद्धिमानी है।
धारा 13 के तहत पति के पास options है कि वह अपने पत्नी से तलाक ले ले । सारे उपाय यदि fail हो जाय तो ये अंतिम उपाय है कि दोनों पक्ष अपना रास्ता अलग कर लें।
निष्कर्ष –
ज़रूरी है कि पति के रूप में आप अपने कर्तब्यों का भली भांति पालन करें। दहेज मांगना या दहेज के नाम पर प्रताडऩा सभ्य समाज में स्वीकार नहीं है। लेकिन यदि पत्नी अपने vested interest के लिए आपको परेशान करती है। मानसिक प्रताड़ना देती है। आप निर्दोष हैं लेकिन भय से चुप चुप रह रहे हैं तो आपकी चुप्पी मामले का निदान नहीं कर सकती। आप आगे आकर क़ानून की मदद लें इसी में ही समझदारी है ।अन्यथा बचाव और चुप्पी के चलते आप अपने लिए बहुत सारी परेशनियाँ और खड़ी कर लेंगे।
अक्सर देखा गया है तलाक के कई मामलों में क्रूरता को ही आधार बनाया जाता रहा है। अधिकांश तौर पर पति या ससुराल पक्ष द्वारा की गयी क्रूरता के मामले सुनने में आते हैं, लेकिन कुछ समय पहले पत्नी द्वारा की गई क्रूरता को भी अदालतों ने संज्ञान में लिया और उसे तलाक का आधार भी माना गया। यहां ऐसे ही कुछ मामले की चर्चा नीचे की जा रही है ।
हाल ही में दिल्ली हाईकोर्ट ने हिंदू विवाह अधिनियम के तहत महिला द्वारा क्रूरता को आधार बनाकर तलाक दिया। मामला नलिनी और गणेश का है। दोनों का एक बेटा निलेश है। नलिनी हमेशा पति को ‘मोटा हाथी’ कहकर बुलाती रही। नलिनी कई बार गणेश के आग्रह को ठुकराकर ‘मोटा हाथी’ कहकर अक्सर उसकी अक्षमता को लेकर ताने मारती थी। यहां तक कि वह हिंसा पर उतारू हो जाती और खुद पर मिट्टी का तेल डालकर बार बार आत्महत्या करने की धमकी देती। साथ ही यह भी कहती कि मैं तुझे और तेरे परिवार को दहेज हत्या के झूठे मामले में फंसा दूंगी फिर तुम सब भुगतोगे ।
उक्त मामले में जज ने यह माना कि इस तरह के ताने मजाक नहीं वरन क्रूरता है और गणेश के प्रेम एवं लगाव का मजाक बनाया जा रहा है। साथ ही उसकी झूठी धमकियां गणेश को संपत्ति के दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर कर देती थी ।
इसी प्रकार का एक और वाकया सुष्मिता का है। सुष्मिता अपनी इच्छा से अपनी मां के साथ पिछले 6 साल से रह रही थी। पति आनंद से उसकी अपेक्षा रहती थी कि वह उन दोनों के बच्चे दुर्गेश के लिए पैसा देता रहे। इससे परेशान होकर आनंद ने अदालत में तलाक का आवेदन किया। पत्नी की इसी क्रूरता को आधार बनाकर अदालत ने तलाक दे दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने भी पत्नी की क्रूरता को तलाक का आधार मानते हुए व्यवस्था दी है कि यदि पत्नी अपने पति पर विवाहेतर संबंध का झूठा आरोप लगाती है, एवं मानसिक रूप से प्रताड़ित करती है तो वह क्रूरता की श्रेणी में आएगा। ऐसा होने पर पति को तलाक पाने का पूरा हक होगा।
हिंदू विवाह कानून में क्रूरता को धारा 13(1)(ia) में समझाया है। सुप्रीम कोर्ट ने विवाह में क्रूरता को विस्तृत रूप से समझाया है। सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे कई बर्ताव बताए हैं, जो क्रूरता की श्रेणी में आते हैं। क्रूरता की परिभाषा का दायरा दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है। यह समाज के लिए चिंता का विषय है। 2 क्रूरता (Cruelty) हिंदू विवाह अधिनियम 1955 की धारा 13 के खंड (1) (क) के अनुसार क्रूरता (Cruelty) को विवाह विच्छेद का आधार बनाया गया है। दूसरे पक्षकार में विवाह के अनुष्ठान के पश्चात यदि अर्ज़ीदार के साथ क्रूरता का व्यवहार किया है तो अर्जीदार इस आधार पर न्यायालय के समक्ष अर्जी पेश कर संबंध विच्छेद के लिए याचिका कर सकता है। क्रूरता में शारीरिक तथा मानसिक दोनों प्रकार की क्रूरता का समावेश किया गया है। हिंदू विवाह अधिनियम के अंतर्गत क्रूरता शब्द को परिभाषित नहीं किया गया है परंतु समय समय पर आने वाले न्याय निर्णय के माध्यम से क्रूरता का अर्थ समृद्ध होता चला गया है। विवाद के बाद पति या पत्नी की चुप्पी क्रूरता की श्रेणी में आती है और हिन्दू विवाह अधिनियम के अनुसार यह तलाक का आधार बन सकती है।
आशा करते हैं हमारा लेख आपको पसंद आया होगा इस तरह के किसी अन्य मुद्दे पर जानकारी के लिए आप हमें ईमेल या कमेंट करके पूँछ सकते है ।
धन्यवाद
द्वारा – रेनू शुक्ला, अधिवक्ता / समाजसेविका
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