अगर किसी ने आपके खिलाफ लिखवा दी है झूठी FIR तो क्या है आपके बचाव में क़ानूनी
How to protect yourself against false FIR
अक्सर कुछ लोग साजिश या किसी रंजिश के तहत एवं दुर्भावना के तहत बेगुनाह लोगों के खिलाफ झूठी रिपोर्ट लिखावा देते हैं, इस पर पुलिस कार्रवाई करते हुए रिपोर्ट में इंगित किए शख्स को बिना किसी छान बीन के गिरफ्तार भी कर लेती है, ऐसे मामलों में आप अपना बचाव कैसे कर सकते है इस पोस्ट के माध्यम से आपको बताने का प्रयास किया है।
हमारे समाज में ऐसे लोगों की कमी नहीं जो कानून का दुरुपयोग करना बहुत अच्छी तरह जानते हैं अक्सर हम रोज़ ये खबरें पढ़ते या सुनते हैं कि किस तरह लोगों को झूठी रिपोर्ट लिखाकर उन्हें फंसाने एवं परेशान करने का काम बखूबी किया जाता है, ऐसा किसी के भी साथ हो सकता है अगर ऐसा हो जाए तो क्या कानूनी रास्ता है, जिससे आप अपना बचाव कर सकते है
इस पोस्ट में यही बताएंगे कि अगर कोई आपके खिलाफ झूठी एफआईआर लिखवा देता है तो आपके पास इससे बचने के लिए क्या रास्ता है।
यदि आपको किसी संगीन मामले के तहत फ़साया नही गया है (जिसमें साथ साल से अधिक की सजा हो) तो सबसे पहले आप सीधा पुलिस के पास जाएँ और पूरी घटना के बारे में खुलकर उन्हें बताएँ की आपको किस तरह किसी रंजिश के तहत फ़साया जा आपको जिस घटना में फ़साया जा रहा है उस दौरान आप कहाँ थे किसके साथ थे इस सबका व्योरा सबूत के साथ पुलिस को दें। पर यदि मामला संगीन है तो आप खुद पुलिस के पास जाने से बचे वर्ना पुलिस आपको अरेस्ट भी कर सकती है । ऐसे में आप किसी इंटर मेडिएटर की मदद लें कोई परिवार का सदस्य मित्र या रिस्तेदार या वकील जो आपकी तरफ़ से पुलिस में जाकर इन सब बातों को उनके सामने रखे । पुलिस से भागें नहीं खुद जाकर या किसी को भेजकर अपनी बात ज़रूर रखें पुलिस आपकी बात ज़रूर सुनेगी। यदि आप भागते हैं तो पुलिस आपको गुनहगार समझ लेती है। याद रहे आपको पुलिस के सामने अपना पक्ष रखकर उन्हें कन्वेंस करना है की वह आपके पक्ष पर भी एक नज़र डालें।उसके बाद सही ग़लत का फ़ैसला करें।
यदि पुलिस को पता चल जाए की सच में मामला झूठा एवं रंजिश के तहत फ़साने का था तो पुलिस को यह अधिकार है की वह उस व्यक्ति को धारा 182 आईपीसी – लोक सेवक को अपनी विधिपूर्ण शक्ति का उपयोग दूसरे व्यक्ति की क्षति करने के आशय से झूठी सूचना देना( IPC Section 182 )के जुर्म में 6 महीने की जेल या जुर्माना या दोनो लगा सकती है।
या पुलिस चाहे तो 211 IPC के तहत क्षति करने के आशय से अपराध का झूठा आरोप लगाने का मामला दर्ज करके इसके लिए सजा – दो वर्ष कारावास या आर्थिक दण्ड या दोनों लगा सकती है ।
पर यदि उस व्यक्ति ने आप पर कोई गम्भीर आरोप लगाया है इस तरह के मामले में साबित होने पर पुलिस / कोर्ट चाहे तो 211 IPC के तहत क्षति करने के आशय से अपराध का झूठा आरोप लगाने का मामला दर्ज करके इसके जुर्म में सात वर्ष तक की सजा भी दे सकती है ।
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पुलिस में सुनवाई न होने पर – आप एसपी को एक निवेदन पत्र देकर मामले के निष्पक्ष माँग की जाँच कर सकते है, यदि आपका जाना सम्भव न हो तो अपने परिवार के किसी सदस्य की मदद से भी यह किया जा सकता है। यदि आपकी सुनवाई किसी भी प्रकार से पुलिस द्वारा नहीं हो रही है तो आपके पास हाई कोर्ट की शरण में जाने का एक मात्र रास्ता बचता है। जो इस प्रकार है –
भारतीय दंड संहिता की धारा 482 में इस तरह के मामलों को चैलेंज करने का प्रावधान है, यदि किसी व्यक्ति ने आपके खिलाफ झूठी एफआईआर दर्ज करवा दी है तो इस धारा का इस्तेमाल आप कर सकते है।
आईपीसी की धारा 482 के तहत जिस व्यक्ति के खिलाफ झूठी एफआईआर दर्ज कराई गई है उसे हाईकोर्ट से राहत मिल सकती है, यदि आप हाई कोर्ट में आपके ख़िलाफ़ हुए ग़लत FIR के लिए अपील करते है तब आपको कोर्ट के जरिए इस मामले में राहत मिल जाएगी , पुलिस को भी अपनी कार्रवाई रोकनी होगी।
क्या है आईपीसी की धारा 482 :-
इस धारा के तहत वकील के माध्यम से हाईकोर्ट में आपके साथ हुए कार्यवाही को लेकर अपील की जा सकती है, इस प्रार्थना पत्र के जरिए आप अपनी बेगुनाही के सबूत भी दे सकते हैं, आप वकील के माध्यम से सभी एविडेंस अछी तरह तैयार करवा सकते हैं, अगर आपके पक्ष में कोई गवाह है या कोई अन्य सबूत तो उसका जिक्र जरूर करें ।
जब ये मामला कोर्ट के सामने आता है और हाई कोर्ट को लगता है कि आपने जो सबूत दिए हैं वो आपके पक्ष को मजबूत बनाते हैं तो हाई कोर्ट के आदेश पर पुलिस को तुरंत कार्रवाई रोकनी होगी, जिससे आपको झूठी रिपोर्ट के मामले में राहत मिल जाएगी।
गिरफ्तार नहीं करेगी पुलिस :-
यदि किसी भी मामले में आपको षडयंत्र करके फंसाया जाता है तो हाईकोर्ट में जाकर स्टे ले सकते है, हाईकोर्ट में केस चलने के दौरान पुलिस आपके खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई नहीं कर सकती है ।
इसके पश्चात यदि आपके खिलाफ वारंट भी जारी हो द को हो तो भी आप गिरफ्तार होने से बच सकते हैं, मामला हाई कोर्ट जाने के बाद इस मामले में आपकी गिरफ्तारी या किसी भी प्रकार की अग्रिम कार्यवाही तबतक नहीं की जाएगी जबतक कोर्ट द्वारा मामला किसी भी निर्णय पर नहीं पहुँचा जाता है ।
लेकिन आपको वकील के जरिए हाईकोर्ट की शरण में ही जाना होगा, अगर हाई कोर्ट आपके प्रार्थना पत्र पर गौर करती है तो केस चलने के दौरान पुलिस की कार्यवाही से बचे रह सकते हैं आवश्यकता पड़ने पर कोर्ट जांच अधिकारी को जांच के लिए जरूरी दिशा-निर्देश भी दे सकती है।उसके बाद हाई किसी भी निर्णय पर पहुँचती है ।इस प्रकार से यदि आप बेगुनाह है तो अपने आपको इन तरीक़ों को अपना कर बेक़सूर साबित कर सकते है साथ हाई जिसने आपको ग़लत तरीक़े से फ़साने की कोशिस की थी उसको सजा भी दिला सकते है ।आपको हमारा लेख कैसा लगा कॉमेंट करके ज़रूर बताए तथा अन्य लोगों के साथ साझा करें ।ताकि लोगों को अपने अधिकार के बारे में जागरूक किया जा सके ।
आशा करते हैं हमारा लेख आपको पसंद आया होगा इस तरह के किसी अन्य मुद्दे पर जानकारी के लिए आप हमें ईमेल या कमेंट करके पूँछ सकते है ।
धन्यवाद
द्वारा – रेनू शुक्ला, अधिवक्ता / समाजसेविका
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