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हाल ही में दिल्ली हाई कोर्ट ने पत्नी की भरण पोषण की मांग वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है- जिसमें सक्षम महिला को भरण-पोषण देने से दिल्ली हाई कोर्ट ने किया साफ इनकार , संबंधित मामले में यह देखते हुए फैसला सुनाया गया कि जीवनसाथी को भरण-पोषण प्रदान करने का कानून अलग हुए साथी को खैरात की प्रतीक्षा कर रहे बेकार लोगों की सेना बनाने के लिए नहीं बनाया गया है, ऐसा कहते हुए दिल्ली हाई कोर्ट द्वारा मंगलवार को पत्नी को सक्षम महिला बताकर भरण-पोषण देने का आदेश देने से इनकार कर दिया, जोकि खुद कमाने मे सक्षम थी । हाई कोर्ट ने माना कि महिला योग्य होने के साथ-साथ पहले नौकरी भी कर चुकी थी, और वर्तमान मे भी कार्यरत है।
संबंधित मामले मे महिला द्वारा पारिवारिक विवाद के चलते दिल्ली के परिवार न्यायालय के समक्ष HMA Section 13(1) (ia) के अंतर्गत क्रूरता के आधार पर तलाक कि मांग कि थी, जिसमे Section 24 कि एप्लीकेशन लगाकर भरण पोषण कि मांग भी की थी, जिसे परिवार न्यायालय द्वारा खारिज कर दिया गया था, जिसके बाद पत्नी ने दिल्ली हाई कोर्ट में फैसले को चुनौती दी थी । पर पत्नी को हाई कोर्ट से भी निराशा ही हाथ लगी । चलिए इस पोस्ट के माध्यम से आगे जानते है क्या था पूरा मामला और हाई कोर्ट ने संबंधित मामले पर अपना क्या व्याख्यान देकर फैसला सुनाया है :-
पीठ ने सुनवाई करते हुए कहा, कि ”इसमें कोई संदेह है कि क्षमता एवं वास्तविक कमाई के बीच बहुत अंतर होता है, लेकिन इस मामले मे ऐसा नहीं है जहां अपीलकर्ता (महिला) के पास केवल क्षमता हैं , बल्कि रिकॉर्ड पर मौजूद दस्तावेज स्पष्ट रूप से साबित भी करते हैं कि वह अभी भी काम कर रही है।
” जस्टिस सुरेश कुमार कैत एवं नीना बंसल कृष्णा द्वारा ऐसी टिप्पणी करते हुए कहा गया तथा हाई कोर्ट द्वारा पारिवारिक अदालत के उस आदेश को चुनौती देने वाली महिला की अपील को भी खारिज कर दिया गया , जिसमें महिला द्वारा अपने अलग हो चुके पति से भरण-पोषण की मांग करने वाली उसकी याचिका को अस्वीकार कर दिया गया था।
मामले कि सुनवाई करते हुए पीठ ने एक अन्य हाई कोर्ट के पिछले फैसलों का हवाला भी दिया, जिसमें कहा गया था कि हिंदू विवाह अधिनियम (एचएमए) की धारा 24 (भरण-पोषण लंबित मुकदमे एवं कार्यवाही के खर्च) को पति-पत्नी में से किसी एक को आर्थिक सहायता प्रदान करने के उद्देश्य से बनाया गया है। जो गंभीर प्रयासों के बावजूद भी अपना भरण-पोषण करने में असमर्थ है ।
यह अधिनियम भरण-पोषण पेंडेंट लाइट दावेदार पति/पत्नी के समर्थन के साथ-साथ मामले की लागत पर भी प्रावधान करने योग्य बनाया गया है।जिसमे पति -पत्नी दोनों मे से कोई भी जो सक्षम नहीं है इसका लाभ ले सकता है ।
हाई कोर्ट ने यह भी माना कि कानून यह उम्मीद नहीं करता है कि कानूनी लड़ाई में शामिल लोग केवल विपरीत पक्ष से पैसा निचोड़ने के उद्देश्य से काम काज मे निष्क्रियता दिखाएंगे । एचएमए की धारा 24 का उद्देश्य असमर्थ लोगों कि मदद करना तथा उन्हे अपने असहाय एवं अयोग्य पार्टनर से सहायता दिलवाना है न कि निष्क्रिय लोगों की एक सेना तैयार करना है, जो किसी खैरात मिलने का इंतजार कर रहे हों।
हाई कोर्ट कि इस टिप्पणी से यह साफ झलकता है कि योग्य व्यक्तियों को उसके पार्टनर से किसी भी तरह का रखरखाव या कानूनी खर्च दिलाने के हक मे नहीं है फिर चाहे वह पति हो या पत्नी ।
संबंधित मामले में, महिला द्वारा याचिका लगाकर 55,000 रुपये के मुकदमेबाजी खर्च के रूप मे तथा 35,000 रुपये प्रति माह के अंतरिम रखरखाव की मांग की गई थी जिसे हाई कोर्ट से खारिज कर दिया गया ।
हाई कोर्ट ने माना कि महिला अपनी शादी के समय शैक्षणिक योग्यता से एम.फिल थी और वर्तमान में उसके पास कंप्यूटर में पेशेवर योग्यता के साथ पीएचडी (प्रबंधन) भी है, और पति द्वारा दिए गए तथ्यों के अनुसार वह वर्तमान में नौकरी भी कर रही है, जबकि पुरुष (पति ) एक साधारण स्नातक है। इसलिए महिला न केवल पति से अत्यधिक योग्य है बल्कि अपनी शादी के समय से भी काम कर रही थी जोकि वर्तमान मे भी कायम है ।
“प्रमुख न्यायाधीश, पारिवारिक अदालत द्वरा यह भी कहा गया कि अपीलकर्ता (महिला) शुरू में यह खुलासा करने में विफल रही कि वह काम कर रही थी पहले से या वर्तमान मे कर रही है । हाई कोर्ट ने यह भी कहा कि यह स्वीकार करना मुश्किल है कि जो व्यक्ति इतना योग्य और सक्षम होगा वह काम नहीं करेगा ।
दस्तावेजों और महिला द्वारा की गई स्वीकारोक्ति से स्पष्ट रूप से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि वर्तमान मे महिला विधायक के कार्यालय में कार्यरत है।
हाई कोर्ट ने कहा कि “हमने पाया है कि वर्तमान मामले में न केवल अपीलकर्ता (महिला) अत्यधिक पढ़ी लिखी और योग्य है बल्किउसके पास कमाई करने की क्षमता भी है, और वर्तमान में वह कमा भी रही है, हालांकि महिला अपनी वास्तविक आय कि सच्चाई से खुलासा करने के लिए इच्छुक नहीं है, और ऐसा व्यक्ति भरण-पोषण का हकदार नहीं ठहराया जा सकता है।
हाई कोर्ट ने माना कि मामलें मे घरेलू हिंसा के खिलाफ महिलाओं की सुरक्षा अधिनियम के प्रावधानों के तहत निचली अदालत से अपीलकर्ता द्वारा भरण-पोषण के दावे को खारिज कर दिया गया है तथा उसे भरण-पोषण देने से इनकार कर दिया गया है। और हम अपील में भी कोई योग्यता नहीं पाते हैं कि मामले मे किसी भी तरह कि सुनवाई या बदलाव कि जरुरत है ऐसा कहते हुए मामले को हाई कोर्ट द्वारा खारिज कर दिया।
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