महिला कर्मचारी ने लगाए यौन उत्पीड़न के आरोप, तो कंपनी ने नौकरी से निकाला, दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा दिया गया मुआवज़ा देने का निर्देश
If the female employee made allegations of sexual harassment, the company fired, the Delhi High Court directed to give compensation
जैसा कि हमसब जानते है कि महिलाओं के साथ आए दिन हो रहे अपराधों की संख्या बढ़ती जा रही है साथ ही महिलाएँ अपने ख़िलाफ़ हो रहे अत्याचार एवं अपराध को लेकर चाह कर भी आवाज़ नहीं उठा पाती है जिसके कई वजह है इनमें से एक सबसे आम वजह है नौकरी से निकाले जाने का डर कुछ ऐसा ही मामला हाल ही में 10 -02-2020 को दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा यौन उत्पीड़न के आरोप के एक मामले की सुनवाई के बाद आदेश देते हुए एक निजी कंपनी को निर्देश दिया है कि वह याचिकाकर्ता महिला को 1.2 लाख रुपये का भुगतान करे । इस महिला को उक्त कंपनी ने कथित रूप से नौकरी से इसलिए निकाला था क्योंकि उसने कम्पनी के कर्मचारी पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए थे । न्यायमूर्ति प्रतिभा एम सिंह ने POSH अधिनियम एवं विशाखा दिशा-निर्देशों के अनुसार आंतरिक शिकायत समिति का गठन नहीं करने के लिए नियोक्ता-कंपनी के खिलाफ कार्रवाई की मांग करने वाली महिला द्वारा दायर रिट याचिका में अंतरिम आदेश पारित किया है । महिला द्वारा इस तरह खुद को नौकरी से निकाले जाने की कार्रवाई को “दुर्भावनापूर्ण कार्य करने , शक्ति का दुरुपयोग एवं मौलिक अधिकारों के उल्लंघन” के रूप में चुनौती दी थी तथा “शारीरिक एवं मानसिक प्रताड़ना के रूप से उसे हुई क्षति एवं अपूरणीय क्षति” के लिए कंपनी से एक करोड़ रुपये का मुआवजा भी मांगा था । दिल्ली महिला आयोग ने कंपनी एवं महिला की शिकायत पर कथित उत्पीड़नकर्ता को नोटिस जारी किए थे । चूंकि कम्पनी द्वारा डीसीडब्ल्यू के नोटिसों का जवाब नहीं दिया था, इसके पश्चात महिला द्वारा हाईकोर्ट में गुहार लगाई गई, 10 फरवरी को याचिकाकर्ता की तरफ़ से अधिवक्ता आदिबा मुजाहिद एवं अभिषेक कौशिक की दलीलें सुनने के बाद न्यायमूर्ति प्रतिभा एम सिंह ने अपने आदेश में कहा, “उत्तरदाताओं 4 एवं 5 के पक्षपात के बिना और यह मानते हुए कि याचिकाकर्ता का मामला यह है कि यौन उत्पीड़न का आरोप लगाने के बाद उसे नौकरी से निकाल दिया गया है, यह निर्देशित किया जाता है कि याचिकाकर्ता को एकमुश्त राशि रुपए 1,20,000 / का भुगतान किया जाएगा, जो इस न्यायालय के आगे के आदेशों के अधीन होगा । ” न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया है कि भुगतान पक्षकारों के अधिकारों एवं अंतर्विरोधों के पक्षपात के बिना किया गया है । आगे की पोस्ट में हम जानेंगे लैंगिक उत्पीड़न/यौन शोषण क्या है एवं इस से सम्बंधित कुछ महत्वपूर्ण जानकरियाँ जिन्हें जानकर हम अपना बचाव कर सकते है ।
लैंगिक उत्पीड़न/यौन शोषण क्या है ?
अधिनियम को समझने में सर्वप्रथम यह समझना जरुरी है कि लैंगिक उत्पीड़न क्या है? केंद्रीय सरकार द्वारा महिलाओं का कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न (निवारण,प्रतिषेध एवं प्रतितोष के अधिनियम २०१३ की धारा 29 द्वारा प्रदत्त शक्तियों के तहत लैंगिक उत्पीड़न को परिभाषित किया गया है।
निम्न में से कोई भी कृत्य, जो अवांछित (unwelcomed) हो), लैंगिक उत्पीड़न होगा-
१. शारीरिक संपर्क या इसी तरह का एडवांस करना. (Physical contact and advances)
२. किसी तरह के सेक्सुअल फेवर की माँग करना. (a demand or request for sexual favors)
३. सेक्सुअल टोन की टिप्पणियां करना (making sexually colored remark)
४. पोर्नोग्राफी दिखाना. (showing pornography)
५. अन्य किसी भी तरह का सेक्सुअल नेचर का अवांछित (शारीरिक, मौखिक, या अमौखिक) कार्य करना ।
यहाँ महत्वपूर्ण सवाल यह उठता है किन् कृत्यों को ‘अवांछित’ कहा जायेगा, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कोई गतिविधि अवांछित है या नहीं वह इस आधार पर तय किया जाता है पीड़ित महिला के दृष्टिकोण में उसे उस व्यवहार से किस तरह महसूस हुआ, अगर महिला किसी व्यवहार से अगर असहज महसूस करती है तो साफ़ तौर पर वह एक्ट उसके लिए अवांछित था ।
इसका तात्पर्य यह है कि महिला को यह साबित करने की जरुरत नहीं है कि उसने उस व्यवहार का एक्टिव विरोध किया, या मौखिक रूप से दोषी व्यक्ति को विरोध जताया है अगर उसने असहज महसूस किया तो वो अपने आप में काफी है।
आम तौर पर यही फॉलो किया जाता है, कि यह जरुरी नहीं कि सेक्सुअल हरासमेंट खुल कर दिखने वाला कोई प्रत्यक्ष कृत्य (overt act) हो, कई बार सेक्सुअल हरासमेंट सतही तौर पर न दिखने वाला पर सूक्ष्म रूप (subtle form) में कार्य करने वाला हो सकता है, उदहारण के तौर पर कुछ सेकंड के लिए रखा गया कमर पर हाथ रखना या औपचारिक रूप से किसी मीटिंग में हाथ मिलाते हुए आम तौर पर स्वीकार्य सेकंडों से ज्यादा देर हाथ थामे रखना भी गलत माना जा सकता है, यह जगह, कॉन्टेक्स्ट पर भी निर्भर करता है,उदहारण के तौर पर आप एक मित्र के तौर पर अपनी महिला मित्र को किसी सोशल फंक्शन में गले लगाते हो , या गाल थपथपाते हो वह शायद २(n) की परिभाषा में न आये पर यही आप अपनी उसी मित्र के साथ ऑफिस में करें तो शायद महिला को असहज महसूस हो और वह २(n) की परिभाषा में आ जाये, परन्तु अंतत: यह महत्वपूर्ण है कि महिला को असहज महसूस हुआ या नहीं, उसे वह एक्ट अवांछनीय लगा या नहीं ।
धारा ३(२) – यह धारा उन स्थितियों में लैंगिक उत्पीड़न की बात करती है जहाँ दोषकर्ता द्वारा माँगा गया सेक्सुअल फेवर महिला द्वारा मना कर दिया गया हो, ऐसे में उस महिला के खिलाफ कार्य स्थल पर द्वेषपूर्ण माहौल बनाना , उसके जॉब सम्बन्धी किसी मुद्दे पर उसके खिलाफ एक्शन लेना जैसे प्रमोशन, इन्क्रीमेंट, भविष्य में एम्प्लॉयमेंट के मुद्दों पर, उसे किसी तरह से धमकाना, या उसके साथ अपमान जनक व्यवहार करना ये सभी एक्शन सेक्सुअल हरासमेंट माने जाते है, परन्तु यह लिस्ट अपने आप में पूर्ण नहीं है, धारा २ (n) स्वयं कहती है कि यह मात्र उदाहरण मात्र लिस्ट है, लैंगिक उत्पीड़न अन्य कई और स्थितियों में भी हो सकता है,
यह एक्ट किन-किन महिलाओं पर लागू होता है-
विशाखा केस की नज़र में कार्यकारी महिला सिर्फ संगठित क्षेत्र में काम करने वाली महिला थी, मजदूर महिलाऐं, घरेलु कर्मचारी एवं अन्य वे महिलाऐं जो असंगठित क्षेत्र में काम करती है उन पर ज्यादा ध्यान नहीं था, परन्तु संगठित क्षेत्र भारतीय अर्थव्यवस्था का एक बहुत छोटा सा हिस्सा मात्र है, अधिकाँश महिलाऐं असंगठित क्षेत्र में काम करती है. इसे ही देखते हुए २०१३ का एक्ट दोनों ही क्षेत्रों की महिलाओं पर लागू होता है. असंगठित क्षेत्र की महिलाओं और घरेलु कर्मचारियों के लिए अधिनियम में अलग से कंप्लेंट मशीनरी की व्यवस्था की गयी है, अधिनियम निम्लिखित संगठनों पर लागू होता है–
१. हर सरकारी उपक्रम पर. मेधा कोतवाल केस में सिविल सर्विसेज रूल्स के तहत भी सेक्सुअल हरासमेंट के विरुद्ध प्रावधान किये गए है।
२. निजी संस्थाओं, गैर सरकारी समूहों, असंगठित कार्यस्थलों पर भी लागू होता है।
३. अधिनियम उन घरों पर भी लागू होता है जहाँ कोई घरेलु कर्मचारी कार्य कर रही है. यह भी ध्यान रखने योग्य है कि इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता की महिला कर्मचारी स्थाई कर्मचारी है या नहीं, इंटर्न, वो ठेकेदार के द्वारा कार्य कर रही है या सीधे, कॉन्ट्रैक्ट लेबर है, प्रोबेशनर सभी तरह की महिला कर्मचारियों पर अधिनियम लागू होता है।
लैंगिक उत्पीड़न की शिकायत कौन कर सकता है – धारा 9 की उपधारा (2) के प्रयोजन के अंतर्गत
- जहां व्यथित महिला, अपनी शारीरिक असमर्थता के कारण शिकायत करने में असमर्थ है, वहाँ उसकी स्वीकृति से निम्न व्यक्ति द्वारा शिकायत की जा सकती है –
- उसका रिस्तेदार या मित्र या उसका सहकर्मी।
- राष्ट्रीय महिला आयोग
- राज्य महिला आयोग का कोई अधिकारी
- या व्यथित महिला की लिखित सम्मति से कोई ऐसा व्यक्ति जिसे घटना की जानकारी हो।
- जहां व्यथित महिला, अपनी मानसिक अक्षमता के कारण शिकायत करने में असमर्थ है, वहाँ निम्न व्यक्ति द्वारा शिकायत फ़ाइल की जा सकती है-
- उसका रिस्तेदार, मित्र
- कोई विशेष शिक्षक
- कोई अहिर्त मनोविकर विज्ञानी या मनोवैज्ञानिक
- संरक्षक या अभिभावक
शिकायत की जाँच कैसे की जाती है –
शिकायत फ़ाइल करते समय धारा ११ के उपबंधों के अधीन शिकायतकर्ता समर्थक दस्तावेज़ों तथा साक्षियों के नाम एवं पता के साथ शिकायत की छह प्रतियाँ शिकायत समिति को प्रस्तुत करना अनिवार्य है।
शिकायत प्राप्त होने पर शिकायत समिति उपनियम (१) के अधीन व्यथित महिला से प्राप्त प्रतियों में से एक प्रति सात कार्य दिवस की अवधि के भीतर प्रत्यर्थी को भेजेगी।
मिथ्या अथवा दुर्भावपूर्ण शिकायत अथवा मिथ्या साक्ष्य पर कारवाई –
यदि कोई व्यक्ति/ महिला द्वारा द्वेशपूर्ण शिकायत या लाँक्षन लगाई जाती है या भ्रामक दस्तावेज प्रस्तुत किए जाते है तो ऐसी स्थिति में नियम 9 के उपबंधो के अंतर्गत व्यक्ति पर कार्यवाही की जाएगी ।
और कहाँ / कैसे कर सकते है शिकायत :-
ज़िला महिला थाना –
महिला सेल –
एंटी रोमियो दस्ता –
प्रदेश स्तर पर हेल्पलाइन –
पुलिस – 112
महिला हेल्पलाइन -1090 / 181
राष्ट्रीय महिला आयोग (National Commission for Women) – www.ncw.nic.in
National Commission for Women
Plot-21, Jasola Institutional Area,
New Delhi – 110025
EPABX NO. – 011 – 26942369, 26944740, 26944754, 26944805
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